शनिवार, 10 दिसंबर 2011

कहिये क्या उपहार दूँ


 आज के मुबारक दिन  पर  सबसे पहले मातारानी का बहुत बहुत शुक्रिया, उस वरदान के लिए ,जो बस   के  मुझे मिला है ...जन्मोत्सव की बहुत बहुत बधाई गुडिया ,जगदम्बा आपको  वो सब दें दें  जिसकी  आप   तमन्ना  रखती है ..जो आपके लिए जरुरी है ..आप हमेशा खुश रहे .भगवती करे  आप जल्दी ठीक हो जाये ...
    


दुआएं  देता चाँद दू  
         बधाई देती चांदनी 
या  चमकते  तारों  का आकाश दूँ 
        कहिये क्या  उपहार दूँ ?


मुस्कुराती सुबह  दूँ 
          खिलखिलाती दोपहरी 
या झूमती हर साँझ दूँ 
            कहिये क्या  उपहार दूँ ?

मनमोहक कोई ख्वाब  दूँ 
         हँसता हुआ ख्याल दूँ 
या ख्वाबों  का ही सतरंगी  संसार  दूँ 
          कहिये  क्या  उपहार दूँ ?

 बरसती हुई आँखे  दूँ 
 अनकहे जज्बात दूँ 
या स्नेह भरा मन भेंट  करूँ 
      कहिये क्या उपहार दूँ ?

छोटी छोटी खुशियाँ  दूँ 
यादों का सौगात  दूँ 
        या  खुशियों  का जहान दूँ 
कहिये क्या उपहार दूँ ?

कहिये क्या  उपहार दूँ ?
कहिये क्या  उपहार दूँ ?   
                                      
                                                  अनहद 



बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

मन मेरा .............

मन मेरा आज फिर से , हुआ बावरा
याद आयी वही ,हर वो कही -अनकही
नज़रों में दुबारा ,वो दौर जिंदा हुआ
खो गए शब्द सारे ,अश्क बहने लगा

चूक मुझसे हुई थी ,कही न कही
तभी तो मिली है ,सज़ा इतनी बड़ी
दोस्त , है आज फिर से ,दौरा पड़ा

ज़िद वही ,मासूम सी , है आज भी
ओठ सीला हुआ सा ,गला रुंधा हुआ

तर्क कोई नहीं ,सून रहा मन मेरा
मन सूनता कहा है ,किसी और का
मन है आज भी , बस आपका

हाँ , कल आज में , है फर्क बड़ा
तब साथ था , हूँ आज अकेला यहाँ
हां अकेला यहाँ ................

अनहद

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सांवली सी वो लड़की

सांवली सी वो लड़की
आँख है जिसकी बड़ी -बड़ी

हंसती है जो फूलो सी
क्या बतलाऊ क्या लगती है
एक आवारे लड़के की

माँ -बेटी हमदम साथी
कोई मुकम्मल नाम नही है ,रिश्ते की
दर्पण -धड़कन ,साँस जीवन
धूप- छांव और धरा -गगन
कैसे बतलाऊ ,क्या लगती है
परिभाषा में बंधी नही है
बस इतना मालूम मुझे है
सब कुछ है वो सांवली लड़की
इक आवारे लड़के की
जान बसी है ,उस पगली में
जो भोली -नादान बड़ी है

इस आवरे 'अनहद'की ////

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

सैनिक का ख़त घरवालो के नाम


लक्ष्मी की अर्चना

माँ हृदय रूपी दीप में वात्सल्य अपना भर लेना
पितृ प्रेम की बाती रख ,लक्ष्मी की अर्चना करना

भाई अपने हृदय दीप में तू ,राष्ट्र सेवा भाव भरना
कर्म की बाती रख कर ,लक्ष्मी की अर्चना करना

बहन अपने हृदय दीप में ,आँखों का सूनापन भरना
बचपन की अवीस्मर्निये यादो की बाती रखकर
लक्ष्मी की अर्चना करना

बेटा तेरा यह बाप कही , हो सके तुझे न देख सके
पर तू अपनी माँ की आँखों में ,मेरी तस्वीर निहार लेना

तुझसे अब मै क्या कहू सखे .............
दीप की नियति है ,अपने तल में अँधेरा समेटे रखना
तू त्याग साधना की प्रतिमूर्ति ,नित्य कर्म पथ पर
तिल- तिल कर जलती रहना
इस जन्म में मुझे क्षमा करना

प्रिये अपने हृदय दीप में ,सजल नयनों का जल भरना
बिरहा की बाती रखकर ,लक्ष्मी की अर्चना करना
लक्ष्मी की अर्चना करना (//)

अनहद

शनिवार, 20 जून 2009

सफर

शुक्रिया ओ हमराही
हमसाया आप का शुक्रिया
ख़त्म हुआ ,मुदद्तो का मुईज्ज़ा
लो सफर पूरा हुआ ,
वक्त आ चला है , रुख़सत का ,
थम गया अब कारंवा ,
सवालों का जबाबो का
हँसने, हँसाने का
रूठने , मनाने का
लड़ने , रुलाने का
डांटने , चिढाने का
समझाने , झुंझलाने का
एक साथ खाने का
मन्दिर में ,साथ सर झुकाने का
अब तो बस बासबब -
बेइंतिहा है सिलसिला
एहसास का ,एतबार का
याद का जज़्बात का
ख्वाब और ख्याल का(२)////
अनहद

शनिवार, 8 नवंबर 2008

डाउन टू अर्थ

वो हमेशा कहती थी
डाउन टु अर्थ रहना
हकीकत में जीना
व्यावहारिक बनना
उड़ने से पहले
पंखो को तोलना
हवाओ से डरना
सपने मत बुनना
नॉर्मल बीहैब रखना
इंसान की तरह रहना
मैं लाचार था ,आदतों से
हरदम रहता था ,
सातवे आसमान में
सोचता था
मेरे ख्वाब ही हकीकत है
बीना पंख उड़ना
हवाओ से लड़ना
सपनो में रंग भरना
उल्टी -सीधी हरकते करना
औरो से अलग दिखना
सबसे जुदा सोचना
शगल थे मेरे
अचानक हवाओ ने
रुख बदला ,चुपके से
गीर पड़ा मैं ,
धम्म से , जमीन पे
लहूलूहान हो गए
ख्वाब सारे
दर्द के एहसास में
आंसूओं की बरसात में
मिट गए ,घरोंदे माटी के
कुछ यूँ निकल गया वक्त हाथ से
जैसे फिसला हो रेत ,बंद मुठ्ठी से
सब कुछ खो के
अब समझ आए मुझे
मायने ,डाउन टु अर्थ के ...............................................................
अमिताभ "अनहद "

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

ख़बर का खेल

नमस्कार ,स्वागत है आपका
ख़बर के खेल में
आरम्भ नियम व शर्त से
खिलाड़ी ,वंशानुगत ,प्रभाव वाले
बगैर विचारे प्रवेश ले
नवोदित,पहुंच विहीन
दूर रहे इस खेल से
अन्यथा ,
उम्मीद पाले ,संघर्ष करे
अनिश्चितकाल के लिए
भुला कर ज्ञान सारे किताब के
दक्ष बने चाटुकारिता में
ज़मीर अपना बेच दे
मन को मसोर के
सोच को मरोर के
शर्म -हया निचोड़ के
नंगापन के पैरोकार बने
भूख,गरीबी ,दर्द,दुःख
जमकर इनका व्यापार करे
मर्यादा का त्याग करे
संस्कारो को दाह के
देह ,मांस ,भक्षण करे
नित्य सूरा सेवन करे
टीआरपी के जनून में
मानवता का खून करे
झूठ के गरूर में
नाम के सरुर में
छल और प्रपंच से
खूब सारा स्टिंग करे
कल्पनाओं को उड़ान दे
रोज नई कथा बुने
तकनीक के कमाल से
उन्हें सदा ठगते रहे
बैठे है जो बेचारगी से
बुद्धू -बक्से के सामने
बस इतना ही इस अंक में
फ़िर मिलेंगे बाद में
बने रहिये साथ में ............................
अमिताभ"अनहद"