बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

# श्रीमान के नाम #



शब्दों को चबा कर बोलने
और
हथेलियों को मसलने भर से ,
हिंदुस्तान की हक़ीक़त नहीं बदलती है
श्रीमान

ठीक, वैसे ही
जैसे एजेंडे और प्रोपगंडे से
झूठ को सच नहीं किया जाता

ठीक वैसे ही
जैसे थकेले और धकेले हुए
गुर्गों के गैंग या षड्यंत्र से
मेहनतकशों की ज़मात को
नकारा नहीं जा सकता

ठीक वैसे ही
जैसे
झूठ के प्रचार और बनावट की खोल से
सियार शेर नहीं बन सकता,

सनद रहे श्रीमान ,
विशाल का ढोंग करके
कोई बौना
कभी विराट नहीं हो सकता

याद रखिएगा
तारीख़ हिसाब मांगेगी,

आपकी दाढ़ी के हर सफ़ेद तिनके से
दिलों -दिमाग का सब स्याह निकलेगा
और जिस दिन ये सब होगा
समय का अट्टहास गूंजेगा

तब उस वक़्त का वर्तमान बोलेगा
आपने पेशे और अवसर दोनो को कलंकित किया है ........

अनहद

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

भाई - बहिन

प्रिय बहिन
अप्रितम स्नेह
अछोह दुलार
अनंत मंगलकामना।
विधाता की कृपा से 
आज भी
कुशल हूँ, विकल हूं
इस बार भी
आए थे ,हनुमान जी।
लेकर आपकी तार
तिलक, रोली,मिठाई ,राखी
वाला प्यार।
मालूम नही मईया ने कुछ कहा,
या मेरे तार का असर था।
जो भी हो इस बार विशेष हो गया।
अरसे बाद ,अबकी बार
आपकी आहट मैने महसूस किया।
शब्दो से परे है ये अनुभूति 
इस वक़्त के लिए बस इतना ही 
आप हमेशा हमेशा ख़ुश रहे.बहिन ।
 
आपका भाई

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

बरगद और सोन चिरइयां

काव्य की शैली में, मेरी पहली कहानी



आज सुनाने आया हूँ, मैं एक कहानी
ना परियों की,ना किसी रानी की
ना दादी की ,ना नानी की

ये कहानी है
दूर देश मे रहने वाले
सोन चिरईयाँ और बरगद की।

शुरुआत उस वक़्त से ,जब बरगद की जड़े
ज़मीन के अंदर
तो, टहनियां,आकाश की ओर
विस्तार ले रही थी।

उन्ही दिनो,किसी रोज
मई की तपती दोपहरी मे
जड़ से फुनगी तक,अचानक
बरगद में सरसराहट हुई
किसी के आने की आहट हुई
शाखों ने ख़बर की
पंखों को तौलती
एक सोन चिरईयाँ ,आई है।
फिर क्या,
टहनियों ने सहारा
और पत्तियों ने दी छाया
सोन चिरईयाँ,पहले पहल सकुचाई
थोड़ी मुस्कुराई, कहा शुक्रिया।

लेकर कुछ पल का विराम
थके पंखों में भरकर जान
बरगद को छोड़,निकल पड़ी
अपने घोंसले की ओर।

इधर ,बरगद झूमने लगा
मन ही मन ,गुनने लगा
सबसे बेहतर, साथी मिल गया।

बरगद और सोन चिरईयाँ की
ये पहली मुलाक़ात थी।

फिर तो,
सिलसिला ही चल पड़ा
मिलने-जुलने,कहने-सुनने का
दिन,तारीख़, समय कुछ भी निश्चित न था,
सिवाय इस बात के,
कभी बेहद लंबे,कभी छोटे
अनकहे, अनसुने,स्थाई  इंतज़ार के ।

जड़वत खड़े,बरगद ने
अपनी शाखों को ,खोल दिया था
दसों दिशाओ में,भुजाओं की तरह।

बरगद की चाहत थी,
सोन चिरईयाँ,जब भी आए,
जिस भी दिशा से आए
पत्तियों और शाखों को
अपनी ज़द में पाए।

ये सब
उस सोन चिरईयाँ के लिए था,
जिसकी किस्मत में विधाता ने
उड़ान ,लिखा था,और पंखों में
सामर्थ्य भरा था,
दिशाएं,समंदर
धरती, अम्बर
सब मापने,सबके पर जाने का।

गुज़रते वक़्त के साथ
आत्मिक हो रहे
बरगद और सोन चिरईयाँ,के रिश्ते में,
तब ,पहली बार ,कड़वाहट वाला क्षण आया था।

यूं तो बरगद बेहद संयमित था,
पर उस रोज,पहली बार
बरगद का संयम,टूट गया।

कई दिनों के बोझिल,आकुल
पहाड़ जैसे इंतज़ार के बाद,
चुपचाप,सहमी सी ,सोन चिरईयाँ
आई थी,संग अपने,
दूर देश जाने का संदेशा लाई थी।

फिर क्या था
अनहोनी की आशंका से बेज़ार
बरगद फूट पड़ा
जुड़े हुए हाथ के साथ
चीखते हुए कहा
जाओ अब कभी मत आना
अब नही है,यहां कोई ठिकाना।

सोन चिरईयाँ ने बहुत कोशिश की
बरगद को समझाने की
अपनी स्थितियों को बताने की,
मानने की,कुछ जताने की
पर, बरगद ने ना सुनने की शपथ उठा ली थी।

रिश्ते को शायद,थी नज़र लग गयी ,ज़माने की
भरोसा टूटने लगा
मनाने  वाला रूठने लगा ।

फिर तो
नाराज़गी और लड़ाईयों का
सिलसिला ही चल पड़ा।
बातों ,मुलाक़ातों का दौर
मुख़्तसर होने लगा।
शब्दों ने ,भाव खो दिया
और शायद,
रिश्ते ने यहीं अपना दम तोड़ दिया।

फिर ,एक रोज़
समंदर के पार से,सोन चिरईयाँ ने ,
औपचारिक संदेशा भेजा,
सुनो,बरगद
"अब मुझे फ़र्क, नही पड़ता"
मग़रूर, बरगद ने चीखते हुए कहा,
"मुझे भी ज़रूरत नही
समझो सब ख़त्म हुआ"।
इस संवाद के बाद
बरगद चुप है आज भी
औऱ सोन चिरईयाँ मौन।
सवाल अब तक मुखर है।
क्या सच मे इस रिश्ते का यही होना था?


अमिताभ भूषण अनहद


























शनिवार, 20 जनवरी 2018

क्षणिकाएं

दोष
न आपका न मेरा
न किसी तीसरे का
जो है, वो तो बस
समय, समझ, सोच का ।

 टीस
 टूटने ,छूटने या चुभने पर ही,नही
 जुड़ने,गूँथने, गुनने पर भी,
 अक्सर,उभर आती है।


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

एहसास

 ( जीवनसाथी ,श्रुति के लिए )  


दिन विशेष
की अशेष
शुभकामनाएं साथी
बड़ा मुश्किल है
चुनना
आपके लिए
 तोहफा
 चाहता हूँ
 उपहार दूँ
 उपहार वो
जो अब से  पहले
किसी ने किसी को 
कभी भी दिया न हो
सूरज से चाँद तक
धरती से आसमान तक
धुप से छावं तक
हावाओं से फिजाओं  तक
बाग़ से बहार तक
नदी से पहाड़ तक
कुछ भी अन्छुआ
अनकहा नहीं है ,
 सिवाय एहसास के
एहसास ,अपने रिश्ते का ,
जो मिला है विधाता से
 जिसें सींचा आपने
 और जिया मैंने
तो संभालिये इस एहसास को
सबसे अलग उपहार को |
जीवन में आपके हर दिन वसंत हो  
हर क्षण उमंग हो ||









गुरुवार, 18 अगस्त 2016

हमेशा सलामत रहे बहिन


अनुभूति
नेह
नीर
प्रण
समर्पण
साहस
आस
और विश्वास
की बेहद ख़ास
लड़ी
आपकी
राखी
बांध ली है
कलाई पर ठीक वहीं
जहां, बांधी थी आपने
पिछली बार
और हां
तिलक भी वहीं है
माथे के ठिक
बीचोंबीच
लड्डू भी है
नारियल वाली
पर बहिन
आपके होने न होने में बहुत फ़र्क है
मईया ,आपको हमेशा खुश रखे,
फ़िलहाल
आँख भर प्रार्थना
हृदय भर शुभकामना
आत्मा भर दुलार
हाथ भर आशीष
आपकी दुनियां
हमेशा सलामत
रहे बहिन।।।।।।
                अनहद

शनिवार, 2 अगस्त 2014

शुक्रिया

मैत्री दिवस की आप सभी मित्रो को हार्दिक मंगलकामनाये।।। सलामत रहे यारों की दुनिया ,चलता रहे यारों का कारवां ।।।मुझे दोस्ती का ककहारा सिखाने वाले दोस्तों की चौकरी के लिए "शुक्रिया"

"शुक्रिया"

दिया वरदान जिन्होंने
आप सब से दोस्ती का,
सबसे पहले देवी मंदिर की
उन ,माँ भगवती का शुक्रिया।

शुक्रिया, गुरुवर
आरके सिंह और मो.तारिक जी का

शुक्रिया सफ़ेद बोर्ड ,डेस्क,बेंच,
अकाउंटस और गणित की किताबों का

शुक्रिया,सेन्ट्रल स्कूल,गन्नीपुर की उन
आरी- तिरछी गलियों का

शुक्रिया,कलमबाग चौक से मिठनपुरा के
उबड़-खाबड़,उखड़े-बिखड़े सड़को का

शुक्रिया, नीम चौक के आगे वाली
 रेलवे गुमटी का

शुक्रिया, डेजी -अभिषेक के
घर के उस आहाते का

शुक्रिया, झमाझम बारिश से लबालब भरे
मोतीझील,कल्याणी,तिलक मैदान रोड का

शुक्रिया, अघोरिया बाज़ार के उस
 पंक्चर लगाने वाले का

शुक्रिया,उन तीन साईकिलों का

शुक्रिया,नारियल के लड्डू,छोले
और मूली के अचार का

शुक्रिया, बहिन
शुक्रिया, गुड़िया
सतीश, शुक्रिया.......।।।